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    आज eye स्पेशलिस्ट बन कर मुफ्त लगा रही है कैंप जानिए पूरी खबर

    आज eye स्पेशलिस्ट बन कर मुफ्त लगा रही है कैंप जानिए पूरी खबर

    मैं एक आई स्पेशलिस्ट हूं और मेरा जीवन वैसे लोगों के जीवन में रोशनी लाने के लिए समर्पित है, जिनके पास महंगे इलाज के लिए पैसे नहीं हैं। गरीबों और असहायों की सेवा की प्रेरणा बचपन में ही मुझे मेरे पिता से मिली, जो डॉक्टर थे। मेरा जन्म बनारस में हुआ। हमारे घर में अक्सर वैसे गरीब किसान आते थे, जिनके हाथ या पैर की उंगलियां काम करते-करते या दुर्घटना में चोटिल हो जाती थीं। चूंकि मेरे पिता ऑर्थोपेडिक सर्जन थे, इसलिए उनका इलाज कर देते थे। पैसे देने में अक्षम लोग कई बार पिता को अनाज दे जाते थे। जब कभी रात में पिता उन गरीबों का इलाज करते थे, तब मैं टॉर्च दिखाकर उनकी मदद करती थी।
    मैं तब बहुत छोटी थी। पिता को परोपकार करते देख मैंने भी उनके पदचिह्नों पर चलने का फैसला किया। चूंकि छोटी उम्र में ही मेरी आंखों पर चश्मा चढ़ गया था और मुझे बार-बार डॉक्टर के पास जाना पड़ता था, इसलिए मैंने आई स्पेशलिस्ट बनने के बारे में सोचा। किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ और मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, दिल्ली में डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने मैक्स और फोर्टिस अस्पतालों में काम किया, लेकिन 2012 में मैंने नेत्रम आई फाउंडेशन नाम की एक संस्था बनाई, जहां आंखों का इलाज होने के अलावा गरीबों की चिकित्सा पर खास ध्यान दिया जाता है। मेरा कार्य क्षेत्र दिल्ली और एनसीआर है। फाउंडेशन में गरीब मरीजों की आंखों की जांच मुफ्त में होती है, जबकि चश्मा, दवा और ऑपरेशन के लिए मामूली पैसे लिए जाते हैं।
    शुरुआत में मैंने आस-पास के करीब 35 ऑप्टिशियन्स को अपने अभियान से जोड़ा। मैं उन्हें आंखों से जुड़ी तमाम बीमारियों के बारे में बताती हूं, फिर उन्हें कहती हूं कि जांच कराने आए लोगों की आंखों में अगर कोई जटिलता दिखे, तो उसकी फोटो खींचकर व्हाट्सऐप पर मुझे भेज दें। जब भी ऐसे मामले सामने आते हैं, हमारी टीम, जिसमें दूसरे डॉक्टर भी हैं, उसका समाधान सुझाती है। इस तरह स्मार्टफोन के जरिये आंखों की बीमारी का पता चल जाता है और उनका इलाज भी सुझा दिया जाता है। जब कोई गंभीर मामला सामने आता है, तब वैसे मरीजों को तत्काल हमारी नेत्रम एंबुलेंस से हमारे अपने बेस सेंटर में ले आया जाता है। दिल्ली-एनसीआर में नेत्रम के अभी तक कुल छह केंद्र खुल चुके हैं।

    हम अलग-अलग इलाकों में आई कैंप भी लगाते हैं, जहां आंखों की जांच तो मुफ्त होती है, जबकि चश्मे के लिए पचास रुपये कीमत ली जाती है। कैंप लगाने में चूंकि खर्च होता है, इसलिए कोशिश यही होती है कि कम से कम सौ चश्मे बिक जाएं। हमारे फाउंडेशन में सप्ताह में दो दिन गरीबों की आंखें मुफ्त में जांची जाती हैं। सिक्योरिटी गार्ड्स, घरों में काम करने वाली महिलाएं, ऑटो चालक, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग और वरिष्ठ नागरिकों को मुफ्त जांच के दायरे में रखा जाता है।

    अब तक हम डेढ़ सौ से अधिक आई कैंप लगा चुके हैं। मामूली सुविधाओं के साथ कभी एक बेसमेंट में शुरू हुआ नेत्रम आई फाउंडेशन आज पांच हजार वर्ग फीट जगह में है और इसके पास पांच डॉक्टरों की टीम है। लेकिन अभी तो मेरे काम की शुरुआत ही हुई है। मैं उस दिन के सपने देखती हूं, जब इस फाउंडेशन की बड़ी-सी बिल्डिंग होगी, अलग से आई इंस्टीट्यूट होगा, जहां डॉक्टरों को ‘तमसो मां ज्योतिर्गमय’ के सेवा भाव से आंखों की बीमारी दूर करने के बारे में बताया जाएगा और गरीबों की सेवा पर खास ध्यान रहेगा।

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