Wednesday , 20 February 2019
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    मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी /	वीरांगना लक्ष्मीबाई बनी कंगना रनोट की पॉवरफुल परफॉरमेंस, कमजोर है फर्स्ट हाफ लेकिन क्लाइमेक्स दमदार

    मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी / वीरांगना लक्ष्मीबाई बनी कंगना रनोट की पॉवरफुल परफॉरमेंस, कमजोर है फर्स्ट हाफ लेकिन क्लाइमेक्स दमदार

    बॉलीवुड डेस्क. मणिकर्णिका की कहानी सन 1800 के दौरान की है जिसमें निर्भीक वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की कहानी बयां की गई है। लक्ष्मीबाई ने अकेले ही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लोहा लिया था। उन्होंने झांसी में फैले अपने साम्राज्य को अंग्रेजों से बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। इस लड़ाई में उनका साथ गौस खान,तात्या टोपे और झलकारी बाई ने दिया था। फिल्म में कंगना ने जहां लक्ष्मीबाई का किरदार निभाया है। वहीं,सदाशिव राव का रोल जीशान अयूब, घौस खान का डैनी डेन्जोपा,तात्या टोपे का अतुल कुलकर्णी और झलकारी बाई का रोल अंकिता लोखंडे ने निभाया है।

    क्या है फिल्म में खास
    फिल्म का फर्स्ट हाफ स्लो है और यही फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी भी है। ढीली एडिटिंग और कहीं-कहीं कहानी को जबरदस्ती टिपिकल बॉलीवुड स्टाइल में रंगने की कोशिश फिल्म को कमजोर बना देती है जैसे झलकारी बाई जब मणिकर्णिका से पहली बार मिलती है तो बेवजह आइटम नंबर जैसा गाना फिल्म में दिखाया जाता है जिसकी जरुरत ही नहीं थी। बाहुबली के राइटर विजयेंद्र प्रसाद द्वारा लिखा गया फिल्म का स्क्रीनप्ले टू द पॉइंट है हालांकि कहीं-कहीं कहानी मेलोड्रामे का रूप भी ले लेती है। फिर भी फिल्म में कई ऐसे जबरदस्त सीन्स देखने को मिलेंगे जो आपको झंझोड़ देते हैं।

    कंगना लक्ष्मीबाई के रोल में बिलकुल फिट बैठी हैं। वह अपने किरदार में डूबी नजर आती हैं। हर सीन में उनकी मेहनत साफ़ नजर आती है। चाहे एक्शन सीन्स हों या इमोशनल,कंगना अपने अभिनय से आपके रौंगटे खड़े कर देंगी। झलकारी बाई के रोल में अंकिता का काम बेहतरीन है लेकिन उनका रोल बहुत छोटा है। किरदार के हिसाब से उनकी बॉडी लैंग्वेज कमाल है। बाजीराव II के रोल में सुरेश ओबेरॉय और गौस खान के रोल में डैनी जमे हैं लेकिन फिल्म का पूरा फोकस केवल कंगना के किरदार पर भी रखा गया है। मणिकर्णिका के पति गंगाधर राव के रोल में जिस्सू सेनगुप्ता का काम कमजोर है।

    इसके अलावा 18वीं शताब्दी के हिसाब से दिखाई गई कहानी का चित्रण भी बढ़िया है और बारीकियों का ध्यान रखा गया है। फिल्म के डायलॉग प्रसून जोशी ने लिखे हैं जो कि देशभक्ति से भरपूर हैं। अगर पहले हाफ पर थोड़ा ध्यान और दिया जाता तो फिल्म और बेहतर हो सकती थी लेकिन सेकंड हाफ आपको सीट से चिपके रहने पर मजबूर कर देगा और आप लक्ष्मीबाई के संघर्ष की गाथा के गवाह बनते चले जाएंगे।

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