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    राजस्थान में बजरी के बजाए अब एम-सैंड पर जोर

    राजस्थान में बजरी के बजाए अब एम-सैंड पर जोर

    जयपुर। राजस्थान में बजरी खनन पर सुपीम कोर्ट की रोक के बाद अब एम-सैंड के रूप में इसका विकल्प खोजा गया है। एम-सैंड विभिन्न खनिजों के चूरे के रूप में बनाई गई मिट्टी है। इसे मैन्युफेक्चर्ड सैंड यानी एम-सैंड कहा जाता है।

    जयपुर में एक कार्यशाल में इस एम सैंड पर प्रेजेंटेशन दिया गया। राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल और खान व भूविज्ञान विभाग, द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस कार्यशाला में बताया गया कि एम-सैंड की लागत नदी की बजरी से भी कम आ रही है।

    राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल की अध्यक्ष और खान व भूविज्ञान विभाग की प्रमुख शासन सचिव अपर्णा अरोरा ने कहा कि प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर 880 मिलियन टन खनिज का मलबा उपलब्ध है जिसका उपयोग एम-सैंड के उत्पादन में हो सकता है। इससे न केवल बजरी की समस्या का हल होगा वरन मलबे का निपटारा करने से होने वाले प्रदूषण की समस्या भी दूर हो सकेगी।

    राजस्थान में अभी दो बड़ी सकारी परियोजनाओं जयपुर की रिंग रोड और द्रव्यवती प्रोजेक्ट में एम-सैंड का इस्तेमाल सफलतापूर्वक किया जा रहा है।

    पर्यावरण विभाग के सचिव राजेश कुमार ग्रोवर ने बताया कि एम-सैंड से मकान, पुल या किसी भी अन्य निर्माण में कोई कमजोरी नहीं आएगी। यह नदी की बजरी के समान ही यह मजबूत है। इस तरह की एम-सैंड का इस्तेमाल कर्नाटक में किय जा रहा है। एम-सैंड प्रदूषण रहित है। प्रदेश में तकरीबन 2200 क्रशर लगे हुए है। अगर इन सभी क्रशन यूनिट्स को एम-सैंड से उत्पादन करने की इजाजत मिल जाये, तो प्रतिदिन 2 लाख टन एम सैंड का उत्पादन किया जा सकता है। एम-सैंड का निर्माण ग्रेनाइट, सैंड स्टोन बसाल्ट, क्वार्टजाइट, पेगमेटाइटिस, चारनोकाइटस, खोंडालाइट्स जैसे खनिजों के मलबे के चूरे से किया जा सकता है।

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