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लड़कियों की शादी की उम्र 15-18 वर्ष रखी: केंद्र  जानबूझकर संसद ने

लड़कियों की शादी की उम्र 15-18 वर्ष रखी: केंद्र जानबूझकर संसद ने

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि संसद ने जानबूझकर लड़कियों की शादी की उम्र को 15 से 18 वर्ष के बीच रखा था। यह फैसला देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए किया गया था। संसद यह फैसला करते समय बाल विवाह के संबंध में अंतरराष्ट्रीय कानूनों से भी वाकिफ थी।
जस्टिस एमबी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता ने मंगलवार को वैवाहिक दुष्कर्म के मामले में सुनवाई करते हुए भारतीय दंड संहिता, बाल विवाह निषेध कानून और हिंदू विवाह अधिनियम में लड़कियों की शादी की उम्र अलग-अलग रखे जाने के तर्क पर सवाल उठाया। पीठ ने 18 साल से कम उम्र में विवाह करने वाली महिला को शादी तोड़ने के लिए अलग-अलग व्यवस्था किए जाने पर भी उंगली उठाई।बाल विवाह निषेध कानून के बावजूद देश में अब भी बाल विवाह जारी रहने पर चिंता जताते हुए पीठ ने कहा कि इसे विवाह नहीं मृगमरीचिका कहा जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि अगर पुरुष और स्त्री दोनों 19 साल के हैं तो उनके बीच विवाह पुरुष की पहल पर निरस्त किया जा सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या किया जाए? जाहिर है किसी नतीजे तक पहुंचने से पहले हमें हर पहलू पर विचार करना होगा। केंद्र सरकार के वकील राना मुखर्जी ने कहा कि देश में अब भी बाल विवाह हो रहे हैं। अत: ऐसे संबंधों से पैदा हुए बच्चों को वैधता देना जरूरी है। इसके मद्देनजर संसद ने जानबूझकर लड़कियों की शादी की उम्र 15-18 वर्ष के बीच रखी थी। मामले की सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।
क्या है मामला सुप्रीम कोर्ट में उस कानून की वैधता पर सुनवाई चल रही है जिसके तहत पुरुष को अपनी 15-18 वर्ष की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने की इजाजत दी गई है। इसके लिए दुष्कर्म को परिभाषित करने वाली धारा 375 में एक अपवाद जोड़ा गया है कि 15 साल या उससे ज्यादा उम्र की पत्नी के साथ संबंध दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आएगा। याचिकाकर्ता इस अपवाद को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं। उनकी दलील है कि इस अपवाद के रहते बाल विवाह निषेध कानून का उद्देश्य कभी पूरा नहीं हो पाएगा।

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