Wednesday , 20 February 2019
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    लोग सोचते हैं, मोदी-शाह ईवीएम में कुछ भी कर सकते हैं, ऐसा होता तो पांच राज्यों में भाजपा चुनाव नहीं हारती

    लोग सोचते हैं, मोदी-शाह ईवीएम में कुछ भी कर सकते हैं, ऐसा होता तो पांच राज्यों में भाजपा चुनाव नहीं हारती

    लोग सोचते हैं कि भाजपा, मोदी-शाह वोटिंग मशीन में कुछ भी करवा सकते हैं। यह सोच गलत है। अगर ऐसा होता तो भाजपा हाल ही में पांच राज्यों में हुए चुनाव हारती नहीं। यह बात पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाय कुरैशी ने कही। सोमवार को पूर्व मुख्य सचिव आर. परशुराम ने कुरैशी की पुस्तक ‘एन अनडाक्यूमेंटेड वंडर द ग्रेट इंडियन इलेक्शन’ पर उनसे सवाल-जवाब किए। इस दौरान श्रोताओं ने भी उनसे चर्चा की।

    ‘एन अनडाक्यूमेंटेड वंडर द ग्रेट इंडियन इलेक्शन’ पुस्तक पर चर्चा
    चुनाव में ‘मनी पावर’ ही सबसे बड़ी प्रॉब्लम- एम्बुलेंस तक में जाता है पैसा
    परशुराम- क्या हम ईवीएम कंट्रोवर्सी खत्म कर सकते हैं?
    कुरैशी- ईवीएम पूरी तरह भरोसेमंद है। हर पार्टी ने सहूलियत के हिसाब से उधम मचाया है। शुरू में बीजेपी ने कहा था- डेमोक्रेसी इन डेंजर। अब कांग्रेस वही शोर मचाती है। क्रिकेट में भी दो ही डीआरएस मिलते हैं। अपनी सूझबूझ इस्तेमाल कीजिए। टॉप दो कैंडिडेट ले लीजिए, जो दो-दो मशीनों पर शक के आधार पर उंगली रख दे…करा लो जांच।

    परशुराम- चुनाव खर्च पर हमेशा सवाल उठते हैं, सभी प्रत्याशियों की मॉनिटरिंग आसान नहीं। आप क्या कहेंगे ?
    कुरैशी- चुनाव में ‘मनी पावर’ ही सबसे बड़ी समस्या है। इस मॉनिटरी फ्रॉड की पूरी मोडस ऑपरेंडी है- एम्बुलेंस तक में जाता है पैसा। अब किसी एम्बुलेंस को रोककर चैक करें और मरीज मर जाए तो हंगामा मच जाए। हम कहते हैं- मरीज अस्पताल में उतर जाए, उसके बाद एम्बुलेंस चेक करो। अब तो फर्जी शादी के जरिये भी पैसा पहुंचाया जा रहा है। एक शादी चल रही है, शानदार पार्टी है, डांस-ड्रिंक्स-डीजे सब चल रहा है… हमने बैंक्वेट हॉल की चेकिंग शुरू कराई तो पाया सिर्फ दूल्हा-दुल्हन ही नहीं हैं, बोगस शादी थी। वैसे दिक्कत नहीं है- एक किराये के दूल्हा-दुल्हन भी अरेंज किए जा सकते हैं। किसी ने कहा- 70 लाख-80 लाख रुपए खर्च का कोई रैशनेल नहीं है। तो रैशनेल क्या है? लीगली एक लिमिट होनी चाहिए ताकि गरीब भी चुनाव लड़ सके। वाजपेयी जी ने कहा था- झूठा रिटर्न भरते हैं एमपी और एमएलए। इसका इलाज पॉलिटिशियंस को ही करना है।

    परशुराम- चुनावों में नेता लगातार लुभावने वादे करते हैं, मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट क्या हो?
    कुरैशी- मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट से सब कुछ रुक जाता है, यह बहुत बड़ा झूठ है। नागालैंड में इलेक्शन हैं तो आपको क्या फर्क पड़ता है? मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट में दो ही बातें हैं- कोई नई स्कीम की घोषणा नहीं होगी, ट्रांसफर नहीं होंगे। पुरानी स्कीमें यथावत चलती रहेंगी। चुनावों के दो हफ्ते पहले ही नेताओं को ब्राइट आइडियाज़ कैसे आते हैं? यह रेगुलर डिबेट है। एक उदाहरण देता हूं- एमपीलैड फंड के तहत तब 2 करोड़ ही खर्च कर सकते थे। केबिनेट सेक्रेटरी चंद्रशेखर ने मुझसे मुलाकात की और कहा कि देशहित का बड़ा मामला है, इसे 5 करोड़ करना है। मैंने कहा जिन 5 राज्यों में चुनाव हैं, उन्हें छोड़कर बाकी पूरे देश में कर दीजिए। हम दोनों ने वॉक करते करते 10 मिनट में 8500 करोड़ के प्रपोजल का यह फैसला लिया।

    श्रोताओं के सवाल रिफॉर्म्स में सुप्रीम कोर्ट का क्या रोल हो?
    कुरैशी- सुप्रीम कोर्ट गार्जियन एंजेल है। नेता एफिडेविट दें, वीवीपैट, फाइनेंशियल डिटेल्स… यह सब सुप्रीम कोर्ट की बदौलत ही हुआ है। इलेक्शन कमीशन का एपॉइंटमेंट सिस्टम मुश्किल है, इसे न्यूट्रल होना चाहिए। जैसे मेरे बारे में कहा गया-

    कांग्रेस एपॉइन्टी है, जरूर सॉफ्ट रहा होगा…
    मैं कहता हूं- कॉलेजियम बना दो ईसी के एपॉइंटमेंट के लिए, तब उंगली नहीं उठेगी। वोट नहीं दे पाए, लिस्ट में नाम नहीं था?

    कुरैशी – 10 लाख बूथ लेवल ऑफिसर्स हैं… जो स्कूल टीचर, पटवारी आदि होते हैं। उनके पास जाइए। एक फॉर्म 7 आता है, उसे भर दीजिए। हम एक कैम्पेन चलाना चाहते हैं- नो योर बीएलओ… बैंक, पोस्टऑफिस, एटीएम पर उस इलाके के बीएलओ की फोटो और कॉन्टैक्ट हो। दिक्कत यह है कि हम वोटिंग के दिन जागते हैं, जबकि हमें अपने बीएलओ से मिलते रहना चाहिए, ताकि पता चले कि लिस्ट में आपका नाम है भी कि नहीं।
    मेरी किताब की लॉन्चिंग का ही किस्सा है। उसमें दीपक पारिख आए थे। और कुछ दिन पहले चुनाव के दौरान लिस्ट से उनका नाम मिसिंग था। इस इवेंट में 400 में से 300 ऐसे और लोग भी आए, जिनका लिस्ट में नाम मिसिंग था। इस पर पीआईएल तक हुई थी। हमने दलील दी- चेक योर रोल। आप लोगों ने अपना नाम रोल में चेक किया क्या? हम इस बारे में लगातार अखबारों में अवेयर कर रहे थे। पारिख ने माना कि वह रोल नहीं चेक कर पाए थे।

    इलेक्टोरल बॉन्ड – बैड आइडिया
    नोटा सबसे ज्यादा तो वही विनर – इल्लीगल है। ब्लैंक वोट को विनर कैसे बना सकते हैं? मोबाइल वोट, यानी आप जिस शहर में जाएं वहां आपका वोट इलेक्ट्रॉनिकली ट्रांसफर हो जाए- यह संभव नहीं, अभी ईवीएम पर ही इतनी हाय-तौबा मचा रखी है, इंटरनेट से वोटिंग पर कौन यकीन करेगा। फेजवाइज इलेक्शन- जरूरी है, क्योंकि सिक्योरिटी लिमिटेड है और बगैर सिक्योरिटी इलेक्शन नहीं करा सकते।

    आपका एक वोट कितना महत्वपूर्ण…कुरैशी ने कुछ किस्से सुनाकर बताया.. सबसे बड़ा मैनेजमेंट इवेंट
    भारत इतना बड़ा देश है कि 2009 से हम 4 ऑस्ट्रेलिया और 2 सिंगापुर अपने में जोड़ चुके हैं। इंडियन इलेक्शंस दुनिया में किसी भी तरह का सबसे बड़ा मैनेजमेंट इवेंट है। पिछले इलेक्शंस में ही 83.40 करोड़ नए वोटर एनरोल किए गए थे। मैं आपको एक वोट की कीमत बताता हूं- गिर, जो एशियाटिक लायन्स के लिए प्रसिद्ध है, वहां के एक गांव में मात्र एक वोट था, एक पुजारी का। इलेक्शन डिपार्टमेंट के 6 लोगों ने वहां जाकर पोलिंग बूथ लगाया। वोटिंग के दिन पुजारी ने दोपहर को वोट डाल दिया तो भी इलेक्शन टीम शाम 5 बजे तक डटी रही, क्योंकि नियम वही था। टेक्निकली कोई उस एक वोट को बोगस बताकर चैलेंज कर सकता था।

    अनिवार्य वोटिंग इलाज नहीं
    लोकतंत्र के साथ अनिवार्य वोटिंग नहीं चल पाएगी। पिछली बार 30 करोड़ लोगों ने वोट नहीं डाले। कल्पना कीजिए कि आप उन पर सजा के तौर पर एक रुपए का भी जुर्माना लगाते हैं तो क्या होगा? आपको सबको नोटिस सर्व करने पड़ेंगे, कोर्ट केस होगा और इस तरह हम 30 करोड़ नए कोर्ट केस पैदा कर देंगे, जहां पहले ही इतनी पेंडेंसी चल रही है। ऐसे में एक ही तरीका है- वोटर एजुकेशन। वोटर को जितना ज्यादा हो सके जागरूक करो। इलेक्शन कमीशन इसी दिशा में काम कर रहा है।

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