Wednesday , 19 September 2018
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    वन विभाग की रिपोर्ट में खुलासा, CG में इस कारण बढ़े हाथियों के हमले

    वन विभाग की रिपोर्ट में खुलासा, CG में इस कारण बढ़े हाथियों के हमले

    रायपुर। छत्तीसगढ़ में लगातार हो रहे हाथियों के हमले के लिए वन विभाग ने वन अधिकार पट्टे बांटने को जिम्मेदार बताया है। कोरबा जिला उप वनमंडलाधिकारी ने एक रिपोर्ट वन विभाग को सौंपते हुए कहा कि हाथियों के हमले वनाधिकार मान्यता कानून 2006 के तहत जारी किए जा रहे पट्टों के कारण बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट में उनका यह भी कहना हैं कि लोग खेती करते हैं और फलदार वृक्ष लगाते हैं, इसी से हाथी के हमले हो रहे हैं।

    छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने इस रिपोर्ट की कड़े शब्दों में निंदा की है। सीबीए ने इसे आदिवासी विरोधी मानसिकता करार दिया है। सीबीए के आलोक शुक्ला, नंदकुमार कश्यप, रिन्चिन, विजय भाई, रमाकांत बंजारे ने संयुक्त बयान जारी करके कहा कि छत्तीसगढ़ के वनों का विनाश जंगल, जमीन पर निर्भर समुदाय की खेती से नहीं, बल्कि खनन परियोजनाओं से हुआ हैं।

    यह रिपोर्ट मूल समस्या से लोगों का ध्यान भटकाने और हाथी समस्या पर अपनी नाकामी छिपाने के लिए खनन कंपनियों के दवाब में तैयार की गई है। हाथी मानव द्वंद्व को रोकने के लिए हजारों करोड़ रुपये राज्य सरकार ऐसी योजनाओं पर खर्च कर चुकी है, जिनसे संघर्ष रुकने की बजाय लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं।

    आलोक शुक्ला ने कहा कि छत्तीसगढ़ में हाथी मानव संघर्ष का मूल कारण खनन व अन्य औद्योगिक परियोजनाओं के लिए वनों का भारी विनाश है। इसके लिए कभी भी वन विभाग ने आपत्तियां नहीं उठाइर्। हाथी के आवास /विचरण क्षेत्रों में हाथी की उपस्थिति को छिपाकर खनन कंपनियों के पक्ष में फर्जी रिपोर्ट प्रस्तुत कर वन स्वीकृतियां हासिल की गई हैं।

    17 जिलों में मानव-हाथी संघर्ष से स्थिति बनी गंभीर

    सीबीए ने कहा कि सिर्फ 4 खनन परियोजनाओं को बचाने के लिए लेमरू एलिफेंट रिजर्व को ही निरस्त कर दिया गया। राज्य सरकार की खनन कंपनियों के मुनाफे के लिए प्रतिबद्घता हाथी और इंसान दोनों के लिए भारी पड़ रही है। छत्तीसगढ़ के 17 जिलों में मानव हाथी संघर्ष की स्थिति बहुत ही गंभीर हो चुकी है।

    पिछले पांच वर्षों में हाथी के हमलों से 200 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। सात हजार घरों को भारी नुकसान हुआ हैं। हाथी प्रभावित क्षेत्रों में ग्रामीण दहशत की जिंदगी जीने पर मजबूर हैं। गांव में समस्त काम ठप्प पड़े हैं, क्योंकि लोग रात में जागने के लिए मजबूर हैं। इस गंभीर परिस्थिति में वन विभाग कोई प्रभावी भूमिका निभाने की बजाए सिर्फ खानापूर्ति करने में लगा हुआ है।

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