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विफल लोग ही आगे जा कर सफल होते है

विफल लोग ही आगे जा कर सफल होते है

मेरा जन्म 20 जून, 1869 को एक छोटे से गांव में हुआ। बचपन से ही मुझे दो चीजों के प्रति लगाव था-यांत्रिक वस्तुओं और पेंटिंग। अपने पिता की इच्छा के खिलाफ लेकिन अपने बड़े भाई की आर्थिक मदद से 1885 में मैंने मुंबई के जेजे आर्ट्स स्कूल में दाखिला लिया। लेकिन दो वर्ष बाद ही आंशिक अंधता के कारण मुझे कला की पढ़ाई छोड़नी पड़ी।

मैंने पेंटिंग छोड़ दी, लेकिन यांत्रिक ड्राइंग कि पढ़ाई जारी रखी। इस कौशल ने काम किया और विक्टोरिया जुबली टेक्निकल इंस्टीट्यूट में मुझे पैंतालीस रुपये वेतन पर शिक्षक की नौकरी मिल गई। लेकिन नौकरी के बजाय अपना उद्यम शुरू करने की इच्छा मन में थी। इसलिए मैंने अपने शहर बेलगाम में श्रीकृष्णा थियेटर के पास साइकिल मरम्मत करने की एक दुकान खोली।

कुछ समय बाद नगरपालिका की ओर से मुझे उस जगह को खाली करने के लिए कहा गया। अब मेरे वर्कशॉप के लिए जगह की समस्या खड़ी हुई, लेकिन औंध के तत्कालीन शासक ने मुझे जगह उपलब्ध कराई। मैंने कुंडल रोड नामक एक रेलवे स्टेशन के पास की बंजर जमीन पर अपना कारोबार शुरू किया, जो नागफनी और नाग सांप से भरा पड़ा था। मुझे मनुष्य की क्षमता और उसकी अच्छाई पर पूरा विश्वास था, इसलिए मैंने उस बंजर भूमि को अपने सपनों का औद्योगिक नगर बनाने के लिए कई साथियों का सहयोग लिया।

मेरे बड़े भाई रामुन्ना ने उस औद्योगिक नगर की योजना बनाई, मेरे एक साथी शंभूराव जांभेकर इंजीनियर के साथ-साथ सभी समस्याओं को दूर करने वाले हरफनमौला व्यक्ति थे, एक विफल छात्र कुलकर्णी को मैंने मैनेजर और कोषाध्यक्ष बनाया और दो सजाप्राप्त अपराधी को नाइट गार्ड के रूप में नियुक्त किया। इस तरह मैंने लोगों पर भरोसा जताकर उनका प्यार हासिल किया, जो मेरी सफलता का पाथेय बना।

उस समय खेती में मशीनों का उपयोग नहीं होता था, इसलिए मैंने कृषि से संबंधित यंत्रों पर अपना ध्यान केंद्रित किया और लोहे का हल बनाया। किसानों को उसके फायदे समझाने और अपने पहले लोहे के हल को बेचने में मुझे दो वर्ष लग गए। फिर तो जो हुआ, वह इतिहास बन गया। लोहे का हल हमारी कंपनी किर्लोस्कर का पहला उत्पाद था।

सूत्र- लोगों की अच्छाई और क्षमता पर भरोसा करें, तो मुश्किल राह भी आसान हो जाती है और सफलता जरूर मिलती है।

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