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    विवादित मामलों से जूझेगी मध्‍यप्रदेश की नई सरकार

    विवादित मामलों से जूझेगी मध्‍यप्रदेश की नई सरकार

    भोपाल। दिसंबर-जनवरी में जब राज्य की नई सरकार बनेगी तो उसे शुरुआत में ही विवादित मामलों से दो-चार होना होगा। चाहे मामला सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट (सीबीडी) प्रोजेक्ट सृष्टि की समयसीमा बढ़ाने और जुर्माना लगाने का हो या निजी संस्थाओं को जमीन देने का या फिर साहूकारी अधिनियम को लागू करने का, इन सभी मामलों पर नई सरकार को निर्णय लेना होगा।

    लिपिकवर्गीय कर्मचारियों की मांग से जुड़ी रमेशचंद्र शर्मा कमेटी की रिपोर्ट और पदोन्‍नति में आरक्षण जैसे मुद्दे भी नई सरकार के सामने होंगे। लोकसभा चुनाव की आचार संहिता के मद्देनजर इन पर फैसला जल्द लेना होगा।

    सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट

    भोपाल शहर की प्राइम लोकेशन पर बने रहे इस प्रोजेक्ट की मियाद 2019 तक बढ़ाने और प्रोजेक्ट में देरी पर जुर्माना लगाने का प्रस्ताव कैबिनेट में रखा था। दरअसल, प्रोजेक्ट को 2015 में पूरा हो जाना चाहिए था पर इसमें लगातार देरी होती गई। इस विवाद को सुलझाने के लिए तत्कालीन अपर मुख्य सचिव वित्त एपी श्रीवास्तव की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई। कैबिनेट सब कमेटी भी बनी।

    सभी ने अपनी रिपोर्ट दे दी। इसमें सिफारिश की गई कि फरवरी 2016 से फरवरी 2017 तक प्रति दिन 1.65 लाख, फरवरी 2017 से फरवरी 2018 तक 1.81 लाख प्रतिदिन और फरवरी 2018 से फरवरी 2019 तक दो लाख रुपए प्रतिदिन जुर्माना वसूला जाए। इस मामले में अभी तक कोई फैसला नहीं हो पाया।

    निजी संस्थाओं को सरकारी जमीन देना

    कुशाभाऊ ठाकरे ट्रस्ट को भोपाल स्थित भदभदा के पास सरकारी जमीन देने से शुरू हुआ विवाद अभी तक नहीं थमा है। ट्रस्ट को जमीन देने के खिलाफ मामला हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक चला गया। अदालत ने निजी या सार्वजनिक संस्थाओं को सरकारी जमीन देने की नीति बनाने के लिए कहा। सरकार ने वित्त मंत्री जयंत मलैया की अध्यक्षता में कमेटी बनाई। कमेटी ने कई दौर की बैठकों के बाद तय किया कि किसी भी संस्था को जमीन देने से पहले उस पर दावे-आपत्ति बुलाए जाएंगे। एक से ज्यादा दावेदार होने पर नीलामी की प्रक्रिया अपनाई जाएगी और जो ज्यादा बोली लगाएगा, उसे जमीन आवंटित की जाएगी। यह नीति अभी विधि और वित्त विभाग के बीच ही झूल रही है। वहीं, जमीन चाहने वालों की लंबी कतार लग गई है।

    पुलिस कमिश्नर प्रणाली

    इंदौर और भोपाल में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने को लेकर मामला उलझा हुआ है। आईएएस और आईपीएस अफसरों में इस व्यवस्था को लेकर दो राय है। यही वजह है कि राजस्व विभाग के जिलों में दांडिक अधिकारी का नया पद बनाने के प्रस्ताव को कैबिनेट में आने से ठीक पहले रुकवा दिया। तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी कोई विवाद में नहीं पड़ना चाहते थे। हालांकि, राजस्व विभाग ने राज्य प्रशासनिक सेवा के कैडर रिव्यू में इन पदों को शामिल करने का प्रस्ताव भेजा है।

    साहूकारी अधिनियम

    किसानों की आत्महत्या के मामलों में साहूकार के कर्ज का बड़ा कारण सामने आने पर सरकार ने साहूकार अधिनियम लागू करने का फैसला किया। इसमें लाइसेंस व्यवस्था लागू करने, ब्याज की दर राज्य स्तर से तय करने, अधिसूचित क्षेत्रों में साहूकारी पूरी तरह बंद करने जैसे प्रावधान करके मसौदा केंद्र सरकार को मंजूरी के लिए भेजा, लेकिन वहां से पेंच फंस गया। वित्तीय और संवैधानिक प्रावधानों से जुड़ा मामला होने की वजह से केंद्र सरकार ने कुछ संशोधन सुझाए हैं। राजस्व विभाग को इन पर काम करके संशोधन के साथ दोबारा प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजना है, लेकिन यह काम अटक गया है।

    रमेशचंद शर्मा कमेटी की सिफारिश

    प्रदेश के 60 हजार से ज्यादा लिपिकों की मांगों को लेकर सरकार ने राज्य कर्मचारी कल्याण समिति के अध्यक्ष रमेशचंद्र शर्मा की अध्यक्षता में कमेटी बनाई थी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी और कर्मचारियों के पक्ष में कई सिफारिशें कीं। सरकार ने भी इनमें से कुछ को जायज मानते हुए इन्हें लागू करने का बार-बार आश्वासन तो दिया पर ठोस कदम नहीं उठाया। जबकि, लिपिक प्रदेश से लेकर तहसील स्तर पर आंदोलन तक कर चुके हैं।

    पदोन्नति में आरक्षण

    पदोन्नति में आरक्षण अधिकारियों-कर्मचारियों से जुड़ा सबसे बड़ा मुद्दा है। फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। नई पीठ का गठन होना बाकी है। हालांकि एम. नागराज के मामले में फैसला आने के बाद पदोन्न्ति की राह खुलने की उम्मीद है।। सरकार को कोर्ट में याचिका दायर कर शीघ्र सुनवाई का निवेदन करना होगा।

    समय पर निर्णय लेने चाहिए: शर्मा

    पूर्व मुख्य सचिव केएस शर्मा का कहना है कि सरकार को समय पर निर्णय लेने चाहिए। जनहित और नीतिगत मामलों से जुड़े विषयों को ज्यादा समय तक नहीं टालना चाहिए। विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव और फिर नगरीय निकाय और पंचायतों के चुनावों की आचार संहिता प्रभावी होगी। ऐसे में नई सरकार के पास कम समय होगा पर जनहित के मुद्दों पर प्राथमिकता के साथ निर्णय लिए जा सकते हैं।

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