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    CBI विवाद: वर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में उठा 36 करोड़ रिश्वत का मामला

    CBI विवाद: वर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में उठा 36 करोड़ रिश्वत का मामला

    नई दिल्ली। कार्यभार से मुक्त किए गए सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। हरियाणा में भूमि अधिग्रहण के एक मामले में किसानों के वकील जसबीर सिंह मलिक ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना की शिकायत का हवाला देते हुए कहा कि उसमें जांच बंद करने के लिए सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को 36 करोड़ रुपए देने का आरोप लगाया गया है। अस्थाना ने यह शिकायत कैबिनेट सचिव से की थी।

    कोर्ट ने मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि वे इस तरह किसी को नहीं छोड़ेंगे। मलिक को संबंधित दस्तावेज दाखिल करने का आदेश देते हुए कोर्ट ने मामले को जनवरी के दूसरे सप्ताह में फिर सुनवाई पर लगाने का आदेश दिया।

    हरियाणा सरकार ने कराई जांच

    यह मामला गुरुग्राम में रिहायशी और व्यवसायिक विकास के लिए 2009-2010 में अधिग्रहीत की गई 1,400 एकड़ जमीन में से हरियाणा सरकार द्वारा बाद में 1,313 एकड़ जमीन छोड़े जाने का है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष नवंबर में अधिग्रहीत जमीन छोड़े जाने के मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए थे ताकि यह पता चल सके कि जमीन छोड़ने के पीछे पैसे के लेन-देन या बिल्डरों से सांठ-गांठ तो नहीं थी। कोर्ट ने सीबीआई को जांच करके छह महीने में रिपोर्ट देने को कहा था।

    सीबीआई ने मांगा वक्त

    शुक्रवार को मामला न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सुनवाई पर लगा। सीबीआई की ओर से जांच पूरी करने के लिए आखिरी मौका मांगते हुए कुछ और समय देने की गुहार लगाई गई। तभी भूस्वामी किसानों की ओर से पेश वकील जसबीर सिंह मलिक ने सीबीआई की मांग पर आपत्ति जताते हुए कहा कि सीबीआई पहले भी जांच पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय मांग चुकी है।

    समय मांगने के पीछे सीबीआई की मंशा ठीक नहीं है। उन्होंने अपनी आपत्ति का कारण बताते हुए कहा कि सीबीआई के विशेष निदेशक (राकेश अस्थाना का नाम लिए बगैर) ने 24 अगस्त, 2018 को कैबिनेट सचिव को चिट्ठी लिखी है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि हरियाणा कैडर के एक आईएएस अधिकारी ने जांच बंद करने के लिए सीबीआई निदेशक को 36 करोड़ रुपए दिए हैं। जसबीर सिंह मलिक ने कहा कि उनके पास इससे संबंधित पत्राचार है। हरियाणा सरकार के वकील ने भी जसबीर मलिक की बात का समर्थन किया।

    यह है मामला

    मामला गुरुग्राम के 58 से 67 सेक्टर के बीच पड़ने वाले आठ गांवों बादशाहपुर, बेहरामपुर, नागली उमारपुरा, तिगरा, उल्लावास, खादरपुर, घाटा और मडवास की 1,400 एकड़ जमीन का है। हरियाणा सरकार ने रिहायशी और व्यवसायिक विकास के लिए 2009 में इन गांवों की 1,400 एकड़ जमीन के अधिग्रहण की धारा-4 की अधिसूचना निकाली थी लेकिन 2010 में सिर्फ 800 एकड़ जमीन के लिए ही धारा-6 की अधिसूचना जारी हुई, बाकी जमीन छोड़ दी गई। इसके बाद मई 2012 में अवार्ड सिर्फ 87 एकड़ जमीन का ही हुआ, बाकी सारी जमीन छोड़ दी गई।

    जिन लोगों की जमीन अंततः अधिग्रहीत कर अवार्ड जारी किया गया उनमें से छह लोगों ने अधिग्रहण को हाई कोर्ट में चुनौती दी और हाई कोर्ट ने अधिग्रहण रद्द कर दिया, जिसके खिलाफ हरियाणा सरकार सुप्रीम कोर्ट आई थी। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान किसानों के वकील जसबीर सिंह मलिक ने आरोप लगाया था कि जिन लोगों ने बिल्डरों को जमीनें दे दीं, उनकी जमीनें अधिग्रहण से छोड़ दी गईं और याचिकाकर्ताओं ने बिल्डरों को जमीन नहीं दी इसलिए उनकी जमीनें अधिग्रहीत कर ली गईं। सरकार की बिल्डरों के साथ मिलीभगत है, हालांकि सरकार ने आरोपों का खंडन किया।

    तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, पूरा मामला देखने से लगता है कि सरकार ने शक्तियों का दुरुपयोग किया है। सरकार ने बिल्डरों को लाभ पहुंचाने के लिए प्रावधानों का बेजा इस्तेमाल किया। मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए ताकि पता चल सके कि जो जमीनें छोड़ी गईं, उनमें पैसे का लेन-देन तो नहीं हुआ। कोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी और सरकार की अपील खारिज कर दी थी।

     

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